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    भारत का अपना (स्वदेशीं) Social Media App 🇮🇳
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  • ओस से नम हुए रास्तों पर नवम्बर किसी फूल की तरह छप रहा है। हर माह एक नया सौंदर्य लेकर आता है। कार्तिक मास उतर गया है, बादलों का घूंघट हौले से उतार कर, चम्पई फूलों से रूप संवार कर जब आकाश धरती के माथे पर चुम्बन टांक देता है तो वह मखमली छुवन नवम्बर बन कर सारी फिज़ाओं में फैल जाती है।
    धूप गुनगुनाने लगती है, शीत मुस्कुराती है। अनायास ही मौसम की खुमारी मन को अकुलाने लगती है। संसार भर का गुड़ आग में भर जाता है। आग मीठी लगने लगती है।
    हवाओं में संदल, छितवन और हरसिंगार की मादक गंध है। बीते त्यौहार की उमंग का कोष धीरे धीरे खर्च होता है। मोर के पंख सिमट गए हैं, रेशमी धागों में कुछ मन बंधने लगे हैं, उनकी दो बातों में ही सारा दिन गुम हो जाने लगा है।
    शाम के कोमल पाँवों में रात की ओट लेकर सूरज लाली लगा रहा होता है और शबनमी चाँद मुस्कान की तरह उभरता है, सितारों की कतार रोशन हो उठती है... ऐसा लगता
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  • कोहरा या कुहासा
    कोहरा कहो या फिर कुहासा —
    जब बहुत ज़्यादा हो जाए तो शीतलहरी ही कह लो।
    थोड़ा बूँद से ठोस की ओर बढ़ चले तो पाला कहते थे हम।
    पाला पड़ना कितना आम था लोकोक्तियों में —
    शायद पहाड़ों की बर्फ़बारी के सापेक्ष।
    मगर इस धुएँ-नुमा ठंड के मौसम में
    हम बच्चों का सबसे बड़ा कौतूहल होता था —
    मुँह से निकलता गरमा-गरम धुआँ।
    किसके मुँह से जितना गाढ़ा धुआँ,
    उसकी उतनी ही धाक।
    कभी आईने पर जमती ओस की परत पर
    उकेर देते कोई आकृति — गोल, तिरछी,
    या नयी-नयी सीखी गई क की मात्रा।
    कभी हवा में उड़ा देते उसे,
    और देखते रहते,
    विलीन होती उस रेखा को बादल में।
    जब कोहरे की घनत्व बढ़ जाती,
    तो खुले मैदानों में लुका-छिपी खेलते थे हम —
    या कल्पना करते कि स्वर्ग का राज्य
    शायद ऐसा ही होता होगा — देवलोक में,
    जहाँ परदे की ज़रूरत ही न पड़ती हो।
    टीवी पर दिखते स्व
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  • आज सुबह मेरे नींद खुलने के पहले से ही यहाँ बारिश हो रही है।
    खिड़की से झांका तो देखा कि पानी के मोतियों के झुंड हरे-हरे पेड़ के पत्तों से ऐसे लिपट रहें थे...
    जैसे मैं बचपन मे जब भी उदास होता था तो अपने दादी से लिपट जाता था वैसे मैं अपने सारे अतीत को बारिश के वक़्त ही खुदेरता हूँ। ☔
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  • लड़कियाँ ख़ूबसूरत होती हैं... उन्हें नेचुरल गिफ़्ट मिला होता है लौंडो को अपनी तरफ़ रिझाने का... लौंडो का मन पागल होता है... उन्हें हल्का नशा सा आता है... छूने का... जकड़ने का... कुछ केमिकल लोचा भी होता है शायद...
    जो पतली कमर और साड़ी देखते ही रीऐक्शन दे देता है... मेरा भी मन करता है... मैं भी चलाऊँ अपनी उँगलियाँ... उसकी पीठ पर... कमर पर... सिहरन में पागल हो जाए वो... जैसे ही उँगलियाँ चलें मेरी... वो पूछे कि क्या लिखा..💗
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  • सुनो...
    खूब ढेर सारी शराब.... ढेर सारी किताबे.... कुछ मनपसन्द म्यूजिक एल्बम... सिगरेट के कुछ बोरे... कहीं दूर पहाड़ी पे एक छोटा सा घर... मैं और तुम...
    जिंदगी को बस इतना ही चाहिए..! ♥️
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